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बुधवार, 24 जून 2020
आखिरकार 200 सालों में कितना बदल गया भारतीय पत्रकारिता का स्वभाव।
हमने क्या लिया और क्या देंगे हम आने वाली पीढ़ी को
साल 1819 में देश में पहली बार विशुद्ध भारतीय समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ था जिस के प्रकाशक थे राजा राममोहन राय।
सोमवार, 1 जून 2020
राजनीति में गणेश परिक्रमा एवं एक व्यक्ति के चेहरे पर बढ़ता भरोसा, राजनितिक दलों के पतन का कारण
नेताओं की गणेश परिक्रमा नहीं जनता से सीधा जुड़ाव है असल राजनीति
एक व्यक्ति के चेहरे से नहीं स्वयं के चेहरे पर लड़े चुनाव,जीत के लिए लझ्य बड़ा होना आवश्यक
सम्राट कुमार
राजनीतिक में खास करके जब किसी पार्टी की सरकार होती है तो उनके समर्थकों में एक भरोसा होता है अपने नेतृत्व के प्रति। कभी-कभी कुछ करिश्माई चेहरे जैसे लालू प्रसाद यादव,नीतीश कुमार, जयललिता, और हालिया प्रकरण नरेंद्र दामोदरदास मोदी ऐसे व्यक्तित्व के साथ अपनी राजनीतिक पारी को शुरू किए की पार्टी नित्य नए आयाम को गढ़ती चली गई। समर्थकों को यह भरोसा हो चला कि वह बगैर मेहनत किए अपने पार्टी नेतृत्व के भरोसेमंद और जनप्रिय छवि के आधार पर चुनाव जीत सकते हैं।
दरअसल किसी भी पार्टी के हाशिए पर जाने में पार्टी समर्थकों की यही सोच सबसे बड़ी कारण बन जाती है।
जब विद्यार्थी अपनी मेहनत के स्थान पर नकल और अपने अभिभावक के उच्च प्रभाव के कारण अपने परिणाम को सुनिश्चित पाता है तू उसकी सीखने की क्षमता घट जाती है और यहीं से शुरू होता है उसका नैतिक और सामाजिक पतन।
कुछ इसी प्रकार के कारक राजनीतिक दलों के लिए भी सत्ता से दूर होने का वजह बन जाता है।
इसका हालिया प्रमाण भाजपा के 6 साल के शासन में प्रमाणित हुआ है। एक समय भारत के राजनीतिक नक्शे पर करीब 84 परसेंट आबादी केसरिया रंग में रंग चुकी थी, लेकिन कार्यकर्ताओं और चुनाव लड़ने वाले नेताओं के केंद्रीय चेहरे पर निर्भर होने की कारण वह धीरे-धीरे अब करीब 48 फ़ीसदी पर शासन पर सिमट चुकी है।
राजनीतिक का मूल मंत्र मेरे अनुसार 123 होता है।
1 अर्थात एक लक्ष्य का चयन।
2 अर्थात अपने मेहनत के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को भी सामने के परीक्षा के लिए पूर्णरूपेण स्वयं पर निर्भर होना और करना।
3 अर्थात लक्ष्य के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल के सिद्धांत का प्रतिपादन। अर्थात चुनाव जीतने के लिए मानसिक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तीनों ही स्तर पर बढ़त बनाने का प्रयास इस रूप में कि चुनाव को जीतना ही नहीं अपितु अपने अलावे सभी उम्मीदवारों का जमानत जप्त करवा देना है इसका भरसक प्रयास स्थानीय स्तर पर हो।
कहने का तात्पर्य कि अगर आप 100 मीटर की दौड़ में भाग लेना चाहते हैं और तैयारी भी 100 मीटर की करते हैं तो संभव है की प्रतिस्पर्धा के दिन शारीरिक या मानसिक किसी भी कारण से आप 80 मीटर या 90 मीटर में थक जाए।
लेकिन अगर यह तैयारी 200 मीटर दौड़ के हिसाब से की जाए तो सुनिश्चित है आप 100 मीटर की दौड़ बगैर किसी बाधा के अपने सभी प्रतिभागियों को पीछे छोड़ जीत लेंगे।
दरअसल किसी भी पार्टी के हाशिए पर जाने में पार्टी समर्थकों की यही सोच सबसे बड़ी कारण बन जाती है।
जब विद्यार्थी अपनी मेहनत के स्थान पर नकल और अपने अभिभावक के उच्च प्रभाव के कारण अपने परिणाम को सुनिश्चित पाता है तू उसकी सीखने की क्षमता घट जाती है और यहीं से शुरू होता है उसका नैतिक और सामाजिक पतन।
कुछ इसी प्रकार के कारक राजनीतिक दलों के लिए भी सत्ता से दूर होने का वजह बन जाता है।
इसका हालिया प्रमाण भाजपा के 6 साल के शासन में प्रमाणित हुआ है। एक समय भारत के राजनीतिक नक्शे पर करीब 84 परसेंट आबादी केसरिया रंग में रंग चुकी थी, लेकिन कार्यकर्ताओं और चुनाव लड़ने वाले नेताओं के केंद्रीय चेहरे पर निर्भर होने की कारण वह धीरे-धीरे अब करीब 48 फ़ीसदी पर शासन पर सिमट चुकी है।
राजनीतिक का मूल मंत्र मेरे अनुसार 123 होता है।
1 अर्थात एक लक्ष्य का चयन।
2 अर्थात अपने मेहनत के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को भी सामने के परीक्षा के लिए पूर्णरूपेण स्वयं पर निर्भर होना और करना।
3 अर्थात लक्ष्य के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल के सिद्धांत का प्रतिपादन। अर्थात चुनाव जीतने के लिए मानसिक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तीनों ही स्तर पर बढ़त बनाने का प्रयास इस रूप में कि चुनाव को जीतना ही नहीं अपितु अपने अलावे सभी उम्मीदवारों का जमानत जप्त करवा देना है इसका भरसक प्रयास स्थानीय स्तर पर हो।
कहने का तात्पर्य कि अगर आप 100 मीटर की दौड़ में भाग लेना चाहते हैं और तैयारी भी 100 मीटर की करते हैं तो संभव है की प्रतिस्पर्धा के दिन शारीरिक या मानसिक किसी भी कारण से आप 80 मीटर या 90 मीटर में थक जाए।
लेकिन अगर यह तैयारी 200 मीटर दौड़ के हिसाब से की जाए तो सुनिश्चित है आप 100 मीटर की दौड़ बगैर किसी बाधा के अपने सभी प्रतिभागियों को पीछे छोड़ जीत लेंगे।
अब आप विचार कीजिए इस प्रकार की तैयारी अगर राजनीतिक दल के चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी स्वयं कर ले और उनके साथ वह करिश्माई नेतृत्व का भी प्रभाव मिल जाए तो परिणाम आशातीत होगा। किस कारण से मिलने वाली जीत जहां कार्यकर्ताओं के मनोबल को आठ में आसमान पर ले जाती है चुनाव लड़ रहे नेताओं की प्रतिष्ठा में भी चार चांद लगती है। फिर भी ना जाने किन कारणों से प्रत्याशी इस प्रकार की तैयारियां करने की जगह अपने टिकट के लिए पार्टी के प्रमुख और अपने पसंदीदा उच्च पदस्थ नेताओं के परिक्रमा में अपना समय गवा देते। इसके बाद परिणाम अगर मनचाहा नहीं मिला तो दोष स्वयं की कमी को देने के स्थान पर संगठन कार्यकर्ता विद्रोह इत्यादि का बहाना बनाकर दूसरों पर दोषारोपण करने लगते हैं।
भारतीय राजनीति की एक परिपाटी रही है कि जिसने जमीन से जुड़कर स्वयं के भरोसे चुनाव जीतने का काम किया है आगे चलकर वहीं देश के लिए आदर्श भी बने हैं।
लेकिन यह आदर्श बनने की होड़ आजकल गणेश परिक्रमा के कारण कहीं पीछे छूटती नजर आ रही है।
अभी समय है कि राजनीतिक दल के प्रमुखों को अपने दल की मर्यादा को बनाए रखने के लिए जनता को जनता के सुख-दुख का सहयोगी और समर्पित नेता देने के लिए उन्हें संगठन और नेताओं की परिक्रमा से परहेज करवाने के लिए कोई नीति तय करनी होगी।
भारतीय राजनीति की एक परिपाटी रही है कि जिसने जमीन से जुड़कर स्वयं के भरोसे चुनाव जीतने का काम किया है आगे चलकर वहीं देश के लिए आदर्श भी बने हैं।
लेकिन यह आदर्श बनने की होड़ आजकल गणेश परिक्रमा के कारण कहीं पीछे छूटती नजर आ रही है।
अभी समय है कि राजनीतिक दल के प्रमुखों को अपने दल की मर्यादा को बनाए रखने के लिए जनता को जनता के सुख-दुख का सहयोगी और समर्पित नेता देने के लिए उन्हें संगठन और नेताओं की परिक्रमा से परहेज करवाने के लिए कोई नीति तय करनी होगी।
सोमवार, 23 मार्च 2020
घर में कुछ दिनों के लिए रहे या दुनिया हमेशा के लिए छोड़ें, चयन हमारा
महामारी का रूप ले चुके "कोरोना"को हराना है या जिन्दगी हारना है
सम्राट कुमार
समूचे विश्व में महामारी का रूप ले चुके "कोरोना" को हराना या उससे जिन्दगी हारना है इसका निर्णय अब हमारे हाथो में है| क्योकिं इस मर्ज की कोई दवा अब तक ईजाद नहीं हो सकी है इसलिए बचाव ही एकमात्र इसका निदान भी है और उपाय भी|
यह एक प्रकार से फैलने वाला रोग है जिससे हम एकांतवास के द्वारा ही रोक पाने में सझम हो सकते है|
इसे आप यूँ समझे की आप-हम विभिन्न कारणों से बाहर रहते या जाते है इस दौरान हमें यह नहीं पता होता की हम जिसके सम्पर्क में आ रहे है उसमे से कौन संक्रमित है या नहीं | इस दौरान गलती से भी आप किसी संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आ गए तो आप तो संक्रमित होंगे ही ये संक्रमण आपके द्वारा आपके पुरे परिवार को लग जाएगा| चुकीं आपके आसपास के लोग यह सोच कर की आपके परिवार का कोई भी सदस्य संक्रमित नहीं है आपके सम्पर्क में आकर संक्रमण का शिकार हो जाएगा |
गौर कीजिए एक की गलती से कितने लोग धीरे-धीरे संक्रमित हो रहे है | तो क्या आप चाहेंगे की जिस परिवार की हंसी-ख़ुशी के लिए आप जी तोड़ मेहनत करते है वे इस बीमारी की चपेट में आये वो भी आपके कारण | ऐसे में अपने लिए,अपने परिवार के लिए सबसे सुरझित मार्ग तो यही है की कुछ दिनों के लिए हम घर पर ही रहे |
लाखोँ लोगों को अपने चपेट में ले चुके इस वायरस से अब तक हजारों की मौत हो चुकी है और वो भी दुनिया के सबसे अमीर और व्यवस्थित चिकित्सा व्यवस्था वाले देश अमेरिका,इटली,चीन,फ़्रांस एवं अन्य यूरोपियन देशो में| वजह केवल एक थी वे भी इसकी भयावहता को मजाक में ले रहे थे, परिणाम आपके सामने है
22 मार्च को जब हम सबने हमारे यस्शवी प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के आग्रह पर एक दिन की जनता कर्फ्यू को सफल बनाया तो दुनिया को लगा की भारत के अनुशासनप्रिय लोग कोरोना को बिना ज्यादा मेहनत के हरा देंगे, लेकिन अगले ही दिन हमने दुनियाभर के लोगों के इस विश्वास को तोड़ दिया
लाकडाउन के बाद हमारा सडको पर उतरना इस खतरे को खुला निमन्त्रण है और हमारे 22 मार्च के प्रयास पर पानी फिर गया
सरकार का कार्य जनता की सुरझा है लेकिन जब जनता स्वयं अपना अहित करने पर आमदा हो जाए तो कर्फ्यू जैसे सख्त कदम उठाने पड़ते है क्योकि हम है तो देश है
इसलिए अब भी समय है कोरोना को हराने की जंग में हम स्वयं को कुछ दिनों के लिए घर के अन्दर रहकर, सरकार के निर्देशों का पालन कर "कोरोना" को हरा सकते है ,
अन्यथा "कोरोना " हमें हराने तो आ ही चूका है
तय कीजिए कोरोना या जिन्दगी
शनिवार, 14 मई 2016
एक्क्न्नी बनाम भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत विकसित कैसे होगा इस पर हमारी सरकार और अर्थशास्त्री चाहे जो कहे
मेरे अल्प ज्ञान के अनुसार जब हमारे यहाँ फ़िर से इक्क्न्नी में सामान मिलने लगेगा भारत विकसित हो सकेगा
क्योकिं हर विकसित देश में वहाँ की मुद्रा का इक्क्न्नी चलता है
रविवार, 8 जनवरी 2012
आँनर किलींग का स्याह पक्ष आँनर सुसाइड
आँनर किलींग
अथार्त सम्मान,इज्जत के लिए हत्या। यह चर्चा आज चाय की चुस्की-यो के साथ गाँव की
चौपाल से लेकर न्याय पालिका की उच्च कुर्सी तक होने वाली विषयों में प्रमुखता से
शामिल है। इस मुद्दे पर समाज की परम्पराओं, सोच की गहराई, आर्थिक विषमता को लेकर मत भिन्नता हो सकती है। किंतु इस आँनर किलींग का एक स्याह पक्ष यह भी है की आँनर के
लिए सिर्फ हत्या ही नही की जाती है, आत्म-हत्या भी होती है। सम्मान-इज्जत के लिए
हत्या और आत्म हत्या। एक सच के दो पहलू है। किंतु पहले पक्ष को चर्चा मिलती है और दूसरे पक्ष को गुम नामी। ऐसा क्यों। इस बाबत हालिया मेरे परिचित के साथ हुई घटना से
मुझे जवाव मिला। जब किसी नये उम्र के अपरिपक्व युवक और युवती द्वारा समाज, धर्म, परम्पराओं, जाति, एवं समूहों दावरा कायम नियमों के विरुद कोई कार्य किया जाता है और इनकी
हत्या कर दी जाती है तो मामला तुल पकड़ लेता है, वही जब किसी नये उम्र के अपरिपक्व
युवक और युवती द्वारा समाज, धर्म, परम्पराओं, जाति, एवं समूहों दावरा कायम नियमों के
विरुद कोई कार्य किया जाता है और इस शर्मिदगी के कारण माता-पिता अगर आत्म-हत्या
करते है तो मामला शांत हो जाता है, यह कहकर कि अमुक लड़का या लड़की के करनी का फल मिला
है और फिर उस युवक और युवती के कृत्य को लोगों की मौन स्वीकृति मिल जाती है चाहे वह सहानुभूति के रुप में हो या परिणाम के असर के कारण हो। अंतत: मौत के बाद ही लोग चुप
हो जाते है। अर्थात हत्या या आत्म-हत्या के बाद लोगों की चुप्पी का एक ही मकसद द्रिष्टिगोचर् होता है की ऐसी वारदातों के बाद उन्हें खुन बहते हुये दिखना चाहिये
चाहे वह जिस रुप में दिखे। क्या यह एक
सभ्य समाज का लक्षण है। कदापि नहीं। किंतु इस पर चर्चा क्यों नहीं?
मेरे एक बुजुर्ग मित्र
ने गत दिनों आत्म-हत्या कर ली। बुजुर्ग मित्र कहने का अभिप्राय यह है कि मेरे पेशा
में हर तरह और हर उम्र के लोगों से सम्बन्ध
रखना पड़ता है । नाम और जगह मैं नहीं लिख सकता हुँ, क्योंकि हमारा मानना है कि मरने
वाला दुनिया के समस्त सांसारिक सम्बन्धों से मुक्त हो जाता है और उनके नाम की चर्चा
उचित नहीं है। प्रसंग यह है कि उनकी लड़की भी उपर्युक्त कथित समाज विरोधी कार्य कर रही थी। इसकी जानकारी जब उनके परिजनों को मिली तो उन्होंने उसे मान-मर्यादा का हवाला देते हुये ऐसा करने से मना किया। फलत: अपने मनोनुकल कार्य न होता जान लड़की ने जहर खाकर आत्म-हत्या की कोशिश की। अभिभावको ने संतान मोह के कारण किसी प्रकार उसकी जान बचा ली। इसके बाद भी लड़की अपने जिद पर अडिग और परिजन लोक-लज्जा के कारण उसे उसकी मनमानी की छुट नहीं दे रहे थे। ऐसे में आम परिवार की तरह उस पर तमाम तरह की पाबंदी लाद दी गई। पर उसके विचार में कोई परिवर्तन नहीं आया। परिणाम मेरे मित्र ने सभी परिस्थितियों के आगे अपने को वे वश पाते हुये आत्म-हत्या कर ली। अब समाज में इसकी चर्चा भी बंद हो गई और लड़की भी शांत हो गई।
क्रमशः:
मंगलवार, 3 जनवरी 2012
उछ्लती गेंद पर फिसलते भारतीय शीर्ष क्रम
उछ्लती गेंद पर फिसलते भारतीय शीर्ष क्रम । यह सच्चाई है भारतीय क्रिकेट टीम की । भारतीय टीम की यह हालात काफी निराशा जनक है। और इसमें भी शर्मनाक यह की जिस मैदान पर भारतीय शीर्ष क्रम विन पेन्दी के लोटा की तरह ज्यादा बाल खेल कर कम रन पर आउट होते है उसी मैदान पर पुछ्ल्ले बल्लेबाज कम गेंद पर ज्यादा बना रहे है।
रविवार, 1 जनवरी 2012
HAPPY NEW YEAR 2012
शनिवार, 31 दिसंबर 2011
नाम नगर पर काम पंचयात से भी कम, (हाल नगर पंचयात कांटी का)
जी हाँ नाम है नगर पंचायत ,पर काम की बात करे तो पंचायत से भी कम। यह है काँटी नगर पंचायत की जमीनी हकीकत ! वर्ष 2002 में नगर पंचायत का दर्जा बिहार के तिरहुत प्रमंडल अंतर्गत मुजफ्फरपुर जिला के काँटी कसवा नामक पंचायत को मिला। इससे इस क्षेत्र के लोगों में विकास को लेकर काफी आशाए जागी। आम-आवाम ने इसकी काफी सराहना की। नतीजा चुनाव में लोगों ने जमकर मतदान किया। लेकिन आज जब इस क्षेत्र को दर्जा मिले 10 वर्ष पूरे हो गये है और तीसरा चुनाव भी सर पर खरा है, तब लोग एक दूसरे से यह पता करना चाह रहे है कि मिला क्या।वर्ष 2002 में कुल 12 वार्ड एवं वर्ष 2007 में कुल 14 वार्ड के लिए काँटी नगर पंचायत में प्रतिनिधि चुने गये थे। इन जन प्रतिनिधियों ने अब तक तीन अध्यक्ष दो बार के कार्य काल में बनाया। इतना ही नहीं तीन बार अविश्वास प्रस्ताव भी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के विरुध पेश कर चुके है।
अब वारी है विकास के कहानी की।
नगर पंचायत के कुल वार्ड में कमोवेश सभी वार्डो में पी सीसी सड़क बन चुका है। लेकिन यहाँ के लोगों प्यास बुझाने के लिए बना पेय जल आपूर्ति केन्द्र तो है किंतु पानी तब ही उपलब्ध होती है जब बिजली हो। भण्डारण की कोई सुविधा नहीं है। कहने को तो थर्मल पावर काँटी में ही है लेकिन बिजली कब आती और कब जाती है आपको पता ही नहीं लगेगा।
क्रमशः
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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011
शासन बदला, प्रशासन बदला पर नहीं बदली तो हालात
बिहार सरकार एवं एन.टी.पी.सी
के संयुक्त उधम काँटी थर्मल पावर स्टेशन के लिए उपर्युक्त जुमला सटीक
है। बिहार राज्य बि धुत बोर्ड के पूर्ण स्वामित्व वाले इस प्रतिष्ठान को
एन.टी.पी.सी के हवाले करने से कोई अलग नतीजा नहीं निकला । नतीजा ठाक के तीन
पात वाली रही। बिजली का वार्षिक औसत उत्पादन में कोई अलग उपलब्धि हासिल
नहीं हो सका । थर्मल तब भी और अब भी पैसों की किल्लत के कारण ठप ही रहता
है। अंतर आया तो इतना कि पहले पैसा बिहार राज्य बि धुत बोर्ड से अनुरोध
करके मंगाया जाता था अब बकाया चुकाने का फरमान भेजा जाता है।
अब सवाल यह है कि इसमें चौ कने वाली बात क्या है? तो ठेठ भाषा में इसे इस तरह समझ सकते है। आप अपनी दुकान की इस आशा में साझेदारी करते है कि आपके साझेदार के साख और व्यापार करने के कला से आपकी दुकान खूब चलेगी और मुनाफ़ा भी खूब होगा । इस प्रत्याशा में आप 100 रुपये के दुकान की बराबर की साझेदारी अपने साझेदार को मात्र 25 रुपये में दे देते है। इसके बाद आपको पता चलता है कि दुकानदारी तो बढी नहीं मुनाफ़ा भी वही रहा । तो आपको मिला क्या? हिसाब किया तो पाया कि दुकान में साझेदार की हिस्सेदारी भी 51% से बढ़कर 74% हो गयी और साझेदार का बकाया भी आप पर चढ़ गया। यही हाल बिहार राज्य बि धुत बोर्ड और एन.टी.पी.सी के इस संयुक्त उपक्रम का है। (सच्चाई के लिए। http://www.ntpcindia.com/index.php?option=com_content&view=article&id=67&Itemid=114&lang=hn देखे) । क्रमशः
अब सवाल यह है कि इसमें चौ कने वाली बात क्या है? तो ठेठ भाषा में इसे इस तरह समझ सकते है। आप अपनी दुकान की इस आशा में साझेदारी करते है कि आपके साझेदार के साख और व्यापार करने के कला से आपकी दुकान खूब चलेगी और मुनाफ़ा भी खूब होगा । इस प्रत्याशा में आप 100 रुपये के दुकान की बराबर की साझेदारी अपने साझेदार को मात्र 25 रुपये में दे देते है। इसके बाद आपको पता चलता है कि दुकानदारी तो बढी नहीं मुनाफ़ा भी वही रहा । तो आपको मिला क्या? हिसाब किया तो पाया कि दुकान में साझेदार की हिस्सेदारी भी 51% से बढ़कर 74% हो गयी और साझेदार का बकाया भी आप पर चढ़ गया। यही हाल बिहार राज्य बि धुत बोर्ड और एन.टी.पी.सी के इस संयुक्त उपक्रम का है। (सच्चाई के लिए। http://www.ntpcindia.com/index.php?option=com_content&view=article&id=67&Itemid=114&lang=hn देखे) । क्रमशः
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शनिवार, 11 जून 2011
आप करो तो ठीक हम बोलें तो गुनाह है
आप करो तो ठीक हम बोलें तो गुनाह है । कांग्रेस की राजनीति और रणनीति शायद यही है। मेरे इस कथन को कांग्रेसी शायद देश द्रोह भी बताने लगे किंतु यह तो सभी भारतीय जानते है कि जब-जब भी देश के बहुसंख्यक लोगों ने ( यहाँ बहुसंख्यक का अभिप्राय जाति या धर्म से नहीं है) किसी भी मुद्दे पर एकता दिखाई तो कांग्रेस पार्टी ने लोगों को ठेंगा बताया है। मामला चाहे भारत में कश्मीर के विलय का हो , स्व-लाल बहादुर शास्त्री के मौत के रहस्य का हो, आपात काल का हो , भारत चीन युद्ध में हिन्दी- चीनी भाई-भाई के नारें का हो , 1971 के भारत पाक युद्ध में गुलाम कश्मीर के वापस पाने के मौका खोने का हो , विदेश से काला धन लाने का हो , इत्यादि कि लम्बी फेहरिस्त है। सभी माम लों में कांग्रेस ने आम जन के भावना ओं को आहत किया है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होंगी कि अंग्रेजों के द्वारा स्थापित कांग्रेस पार्टी भले ही आजाद भारत का प्रतिनिधित्व करती आ रही है किंतु इसके सभी नेताओं की सोच आज भी उपनिवेश काल के अंग्रेजों के समान है। इस जगह किसी शायर की यह पंक्ति "हमें अपनों ने लूटा गैरों में कहा दम था , हमारी कश्ती डूबी वहाँ जहाँ पानी कम था" बिलकुल सटीक बैठ्ती है ।
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