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बुधवार, 24 जून 2020

आखिरकार 200 सालों में कितना बदल गया भारतीय पत्रकारिता का स्वभाव।


हमने क्या लिया और क्या देंगे हम आने वाली पीढ़ी को


साल 1819 में देश में पहली बार विशुद्ध भारतीय समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ था जिस के प्रकाशक थे राजा राममोहन राय।
बंगाली भाषा में प्रकाशित इस समाचार पत्र का नाम था "संवाद कौमुदी", जिस का हिंदी अर्थ होता है बुद्धि का चांद।
इसके बाद कई भाषाई और हिंदी अखबार भारत में चालू भी हुए और बंद भी हुए। लेकिन एक समानता सभी अखबारों में समान थी। वह था उस वक्त के प्रकाशको और पत्रकारों ने अपनी कलम को समाज और राष्ट्र की सेवा का माध्यम बनाया। सती प्रथा बाल विवाह जातिवाद आडंबर का उन्मूलन करने में सही मायनों में अखबार ने महती भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं देश में क्रांतिकारी भावना को जगाने में राष्ट्र को एकजुट करने में इन अखबारों ने अमूल्य योगदान दिया था।
लेकिन पत्रकारिता और समाचार पत्र के विकास के 200 साल पूरे होने पर जो स्थिति बनी है वह बहुत ही अफसोसजनक और पीड़ादायक।
कहने में अच्छा तो नहीं लगता लेकिन हकीकत यही है कि आज की पत्रकारिता मैं समाज सेवा, मानवता, करुणा, समाज और देश के प्रति कुछ कर गुजरने या उसमें परिवर्तन लाने की भावना समाप्त हो गई है। लगता है आज के समाचार पत्र और पत्रकार सिर्फ एक ही भावनाओं को पकड़ कर बैठे हैं कि उन्हें स्वयं का महत्व तो दिखाना है, अधिकार जताना है लेकिन जब बात कर्तव्य की हो तो उस वक्त पीठ दिखा कर निकल जाना है।
केवल पैसे और पैसे के लिए आज के प्रकाशक और पत्रकार दिन रात एक किए हुए। उनमें इतना तक भाव नहीं है कि वह जो समाचार लिख रहे हैं उससे समाज में देश में प्रतिकूल या अनुकूल प्रभाव पड़ेगा, समाज वैचारिक रूप से उन्नत होगा या वैचारिक रूप से नीचे गिरेगा, उस समाचार का महत्व आमजन के जीवन को सुगम बनाएगा या दुर्गम कर देगा, इत्यादि इत्यादि अनेकों अनेक चीजों को दरकिनार कर केवल अपने और अपने प्रकाशक के लिए लाभ कमाने तक आज की पत्रकारिता ठहर सी गई है।
क्या भारत अपने पूर्ण विकास को प्राप्त कर चुका है, क्या आम जनजीवन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ जीवन यापन और विकल्पों का चयन कर चुकी है, यदि नहीं तो पत्रकारिता का यह स्वरूप वास्तव में भयावह और डराने वाला है।




सोमवार, 1 जून 2020

राजनीति में गणेश परिक्रमा एवं एक व्यक्ति के चेहरे पर बढ़ता भरोसा, राजनितिक दलों के पतन का कारण

नेताओं की गणेश परिक्रमा नहीं जनता से सीधा जुड़ाव है असल राजनीति

एक व्यक्ति के चेहरे से नहीं स्वयं के चेहरे पर लड़े चुनाव,जीत के लिए लझ्य बड़ा होना आवश्यक

सम्राट कुमार

राजनीतिक में खास करके जब किसी पार्टी की सरकार होती है तो उनके समर्थकों में एक भरोसा होता है अपने नेतृत्व के प्रति। कभी-कभी कुछ करिश्माई चेहरे जैसे लालू प्रसाद यादव,नीतीश कुमार, जयललिता, और हालिया प्रकरण नरेंद्र दामोदरदास मोदी ऐसे व्यक्तित्व के साथ अपनी राजनीतिक पारी को शुरू किए की पार्टी नित्य नए आयाम को गढ़ती चली गई। समर्थकों को यह भरोसा हो चला कि वह बगैर मेहनत किए अपने पार्टी नेतृत्व के भरोसेमंद और जनप्रिय छवि के आधार पर चुनाव जीत सकते हैं।
दरअसल किसी भी पार्टी के हाशिए पर जाने में पार्टी समर्थकों की यही सोच सबसे बड़ी कारण बन जाती है।
जब विद्यार्थी अपनी मेहनत के स्थान पर नकल और अपने अभिभावक के उच्च प्रभाव के कारण अपने परिणाम को सुनिश्चित पाता है तू उसकी सीखने की क्षमता घट जाती है और यहीं से शुरू होता है उसका नैतिक और सामाजिक पतन।
कुछ इसी प्रकार के कारक राजनीतिक दलों के लिए भी सत्ता से दूर होने का वजह बन जाता है।
इसका हालिया प्रमाण भाजपा के 6 साल के शासन में प्रमाणित हुआ है। एक समय भारत के राजनीतिक नक्शे पर करीब 84 परसेंट आबादी केसरिया रंग में रंग चुकी थी, लेकिन कार्यकर्ताओं और चुनाव लड़ने वाले नेताओं के केंद्रीय चेहरे पर निर्भर होने की कारण  वह धीरे-धीरे अब करीब 48 फ़ीसदी पर शासन पर सिमट चुकी है।
राजनीतिक का मूल मंत्र मेरे अनुसार 123 होता है।
1 अर्थात एक लक्ष्य का चयन।
2 अर्थात अपने मेहनत के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को भी सामने के परीक्षा के लिए पूर्णरूपेण स्वयं पर निर्भर होना और करना।
3 अर्थात लक्ष्य के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल के सिद्धांत का प्रतिपादन। अर्थात चुनाव जीतने के लिए मानसिक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तीनों ही स्तर पर बढ़त बनाने का प्रयास इस रूप में कि चुनाव को जीतना ही नहीं अपितु अपने अलावे सभी उम्मीदवारों का जमानत जप्त करवा देना है इसका भरसक प्रयास स्थानीय स्तर पर हो।

कहने का तात्पर्य कि अगर आप 100 मीटर की दौड़ में भाग लेना चाहते हैं और तैयारी भी 100 मीटर की करते हैं तो संभव है की प्रतिस्पर्धा के दिन शारीरिक या मानसिक किसी भी कारण से आप 80 मीटर या 90 मीटर में थक जाए।
लेकिन अगर यह तैयारी 200 मीटर दौड़ के हिसाब से की जाए तो सुनिश्चित है आप 100 मीटर की दौड़ बगैर किसी बाधा के अपने सभी प्रतिभागियों को पीछे छोड़ जीत लेंगे।

अब आप विचार कीजिए इस प्रकार की तैयारी अगर राजनीतिक दल के चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी स्वयं कर ले और उनके साथ वह करिश्माई नेतृत्व का भी प्रभाव मिल जाए तो परिणाम आशातीत होगा। किस कारण से मिलने वाली जीत जहां कार्यकर्ताओं के मनोबल को आठ में आसमान पर ले जाती है चुनाव लड़ रहे नेताओं की प्रतिष्ठा में भी चार चांद लगती है। फिर भी ना जाने किन कारणों से प्रत्याशी इस प्रकार की तैयारियां करने की जगह अपने टिकट के लिए पार्टी के प्रमुख और अपने पसंदीदा उच्च पदस्थ नेताओं के परिक्रमा में अपना समय गवा देते। इसके बाद परिणाम अगर मनचाहा नहीं मिला तो दोष स्वयं की कमी को देने के स्थान पर संगठन कार्यकर्ता विद्रोह इत्यादि का बहाना बनाकर दूसरों पर दोषारोपण करने लगते हैं।
भारतीय राजनीति की एक परिपाटी रही है कि जिसने जमीन से जुड़कर स्वयं के भरोसे चुनाव जीतने का काम किया है आगे चलकर वहीं देश के लिए आदर्श भी बने हैं।
लेकिन यह आदर्श बनने की होड़ आजकल गणेश परिक्रमा के कारण कहीं पीछे छूटती नजर आ रही है।
अभी समय है कि राजनीतिक दल के प्रमुखों को अपने दल की मर्यादा को बनाए रखने के लिए जनता को जनता के सुख-दुख का सहयोगी और समर्पित नेता देने के लिए उन्हें संगठन और नेताओं की परिक्रमा से परहेज करवाने के लिए कोई नीति तय करनी होगी।

सोमवार, 23 मार्च 2020

घर में कुछ दिनों के लिए रहे या दुनिया हमेशा के लिए छोड़ें, चयन हमारा

महामारी का रूप ले चुके "कोरोना"को हराना है या जिन्दगी हारना है

सम्राट कुमार 

समूचे विश्व में महामारी का रूप ले चुके "कोरोना" को हराना या उससे जिन्दगी हारना है इसका निर्णय अब हमारे हाथो में है| क्योकिं इस मर्ज की कोई दवा अब तक ईजाद नहीं हो सकी है इसलिए बचाव ही एकमात्र इसका निदान भी है और उपाय भी|
यह एक प्रकार से फैलने वाला रोग है जिससे हम एकांतवास के द्वारा ही रोक पाने में सझम हो सकते है|

इसे आप यूँ समझे की आप-हम विभिन्न कारणों से बाहर रहते या जाते है इस दौरान हमें यह नहीं पता होता की हम जिसके सम्पर्क में आ रहे है उसमे से कौन संक्रमित है या नहीं | इस दौरान गलती से भी आप किसी संक्रमित व्यक्ति के सम्पर्क में आ गए तो आप तो संक्रमित होंगे ही ये संक्रमण आपके द्वारा आपके पुरे परिवार को लग जाएगा| चुकीं आपके आसपास के लोग यह सोच कर की आपके परिवार का कोई भी सदस्य संक्रमित नहीं है आपके सम्पर्क में आकर संक्रमण का शिकार हो जाएगा |

गौर कीजिए एक की गलती से कितने लोग धीरे-धीरे संक्रमित हो रहे है | तो क्या आप चाहेंगे की जिस परिवार की हंसी-ख़ुशी के लिए आप जी तोड़ मेहनत करते है वे इस बीमारी की चपेट में आये वो भी आपके कारण | ऐसे में अपने लिए,अपने परिवार के लिए सबसे सुरझित मार्ग तो यही है की कुछ दिनों के लिए हम घर पर ही रहे |

लाखोँ  लोगों को अपने चपेट में ले चुके इस वायरस से अब तक हजारों की मौत हो चुकी है और वो भी दुनिया के सबसे अमीर और व्यवस्थित चिकित्सा व्यवस्था वाले देश अमेरिका,इटली,चीन,फ़्रांस एवं अन्य यूरोपियन देशो में| वजह केवल एक थी वे भी इसकी भयावहता को मजाक में ले रहे थे, परिणाम आपके सामने है 

22 मार्च को जब हम सबने हमारे यस्शवी प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के आग्रह पर एक दिन की जनता कर्फ्यू को सफल बनाया तो दुनिया को लगा की भारत के अनुशासनप्रिय लोग कोरोना को बिना ज्यादा मेहनत के हरा देंगे, लेकिन अगले ही दिन हमने दुनियाभर के लोगों के इस विश्वास को तोड़ दिया 
लाकडाउन के बाद हमारा सडको पर उतरना इस खतरे को खुला निमन्त्रण है और हमारे 22 मार्च के प्रयास पर पानी फिर गया 

सरकार का कार्य जनता की सुरझा है लेकिन जब जनता स्वयं अपना अहित करने पर आमदा हो जाए तो कर्फ्यू जैसे सख्त कदम उठाने पड़ते है क्योकि हम है तो देश है 

इसलिए अब भी समय है कोरोना को हराने की जंग में हम स्वयं को कुछ दिनों के लिए घर के अन्दर रहकर, सरकार के निर्देशों का पालन कर "कोरोना" को हरा सकते है ,
अन्यथा "कोरोना " हमें हराने तो आ ही चूका है 
तय कीजिए कोरोना या जिन्दगी

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

केन्द्र का शासकवर्ग यौवन अवस्था की चंचलता में , जनता का करे कौन विचार


कहते है कि यौवन अवस्था में मन चंचल होता है, और विचार कभी स्थिर नहीं रहते है, और इस उम्र में कभी यह करु यह नहीं करु का विचार  बसंत रितु के उमड़-घुमड़ बादल की तरह आता-जाता रहता है। ठीक यही सब कुछ केन्द्र की सत्ता में आसीन कांग्रेस गठबंधन सरकार के साथ भी हो रहा है। कहने को तो 79 बसंत देख चुके हमारे प्रधान मंत्री और उनके मंत्रि-मंडल के सहयोगी उम्र तन प्रोढ़ है किंतु जन आकांक्षा के अनुरूप अब तक वैचारिक, सैद्धांतिक, या निति गत रुप से अपने को प्रोढ़ साबित नहीं कर सके है।यही कारण है कि जनता की गाढी कमाई से जमा धन भांडार का अपव्यय सरकार की दिनचर्या बन गई है। चाहे वह घोटालो के रुप में हो, निर्णय बदल ने के रुप में हो या शक्तिशाली बनने के लिए किसी अन्य देश में एक दशक पुर्व इस्तेमाल की गई तकनीक को अपना ने की हो, हर जगह मार आर्थिक रुप से जनता को ही सहनी पड़ रही है। मामला चाहे कभी बाबा रामदेव की भ्रष्टाचार विरोधी रैली में अर्द्द्-रात्री मे लाठी चलवाकर निर्दोषो की पिटाई का हो, अन्ना के जन लोकपाल आंदोलन के दौरान अन्ना एवं उनके सहयोगी यो को जेल भेज कर फिर जना आक्रोश के मद्देनजर रात्री में ही रिहाई करवाने और आंदोलन के लिए जगह उपलब्ध करने का हो, चीन के बठते सीमा-पार घुस-पैठ पर चुप्पी का हो, बटला हाउस मुठ-भेड़ का हो, सेनाध्यक्ष की उम्र का हो या विकास के प्रतीक बन गये गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ का हो, गाहे-बगाहे हर बार सरकार, कांग्रेस और इसके करता-धर्ता चंचलता का परिचय देते रहते है। जबकि ऐसे मुद्दों पर जनता की चाह प्रौढ़ता और दिशा देने वाली कार्य  और बयान की होती है।