youtube link
Khabren Live यह एसके डिजिटल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड की एक इकाई है। हम अपने दर्शकों के लिए सबूत के साथ तार्किक और खोजी समाचार पेश करते हैं क्योंकि हम पत्रकारिता को व्यवसाय के रूप में नहीं बल्कि लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में अपनी जिम्मेदारी के रूप में लेते हैं। एक चैनल के रूप में हमारी पहली प्राथमिकता देश, देश के लोकतंत्र और देश के नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ देना है।
रविवार, 19 मई 2024
बुधवार, 3 मार्च 2021
बिहार सरकार के भूमि राजस्व विभाग में बरसों से कार्यरत है "भगवान"
सम्राट कुमार
जी आपने सही शीर्षक पढा है। यह किसी कवि की कल्पना नहीं और ना ही कोई आकर्षक शीर्षक है, बल्कि यह भूमि राजस्व विभाग के मुजफ्फरपुर जिला में भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी के एक निर्णय के अवलोकन से यह सत्य जाहिर हुआ है।
बिहार सरकार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 11 सितंबर 2019 को पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कहा था कि बिहार में कुल अपराध में 60 फ़ीसदी अपराध भूमि विवाद के कारण होते हैं। मुख्यमंत्री की इस स्वीकारोक्ति एवं भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी के आदेश को अगर एक परिपेक्ष में रखें तो पता चलता है कि बिहार में हजारों करोड़ खर्च कर होने वाले चकबंदी व्यर्थ है। क्योकि अगर पुराने विवाद ही समाप्त नहीं हुए तो नए चकबंदी से विवाद हटेगा नहीं और बढ़ जाएगा
आपके मन में यह जिज्ञासा आपको परेशान कर रही होगी कि आखिर बिहार भूमि राजस्व विभाग में भगवान कैसे नियुक्त है। आइए आपकी इस उत्कंठा को हम शांत करते हैं। दरअसल मुजफ्फरपुर जिले के भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी द्वारा दाखिल खारिज वाद संख्या 163/12-13 में दिनांक 29-9 -2016 को पारित आदेश में लिखा है कि उत्तर वादी संख्या एक के वारिसों ने दिनांक 22 फरवरी 2017 को एक आवेदन दिया जिसमें उन्हें पक्षकार बनाने की बात कही गई थी।
अब आप ही बताएं अपने आदेश के 5 महीने बाद होने वाली घटना को तारीख सहित अपने आदेश में उल्लेख करने वाले पदाधिकारी क्या सामान्य इंसान होंगे। भविष्य में नियत तारीख को क्या होगा यह ईश्वर के अलग है कोई नहीं जानता। ऐसे में भूमि राजस्व विभाग के भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी क्या भगवान से कम है?
अब आते हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा अपराध में 60% योगदान भूमि विवाद के संदर्भ पर। इसी आदेश के अगले पंक्ति में भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी या कहें भगवान ने कहा है कि चुकी विवादित जमीन पर मकान है इसलिए दाखिल खारिज कैंसिल नहीं किया जा सकता है। मुजफ्फरपुर में वरीय आरक्षी अधीक्षक आवास के पास के सिकंदरपुर मन की जमीन को भी बहुत सारे लोगों ने दाखिल खारिज करा कर मकान बना लिया है। इस आदेश के अनुसार वह सारे वैध होगा।
अंत मे मुख्यमंत्री की बात और निर्णय के अवलोकन के पश्चात यही निष्कर्ष निकलता है कि बिहार में भूमि विवाद को बढ़ावा देने में आम लोगों से ज्यादा बिहार भूमि राजस्व विभाग के "कथित भगवान" की भूमिका ज्यादा है। अब निर्णय के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो यह भी संभावना बनती है कि उक्त भूमि सुधार उप समाहर्ता ने अपने स्थानतरण के बाद जब इस मामले की पैरवी करने विपक्षी पार्टी ने किसी तरह से सेटिंग कर ली तो 22 फरवरी 2017 को आवेदन दिया और उस आवेदन के आलोक में स्थानांतरित भूमि सुधार उप समाहर्ता ने पूर्व की तारीख में अपना निर्णय दिया। लेकिन वह कहते हैं ना की
"सत्यमेव जयते " लाख झूठ को छिपाने का प्रयास करो सत्य में वो ताप है प्रकट हो ही जाएगा
बुधवार, 24 जून 2020
आखिरकार 200 सालों में कितना बदल गया भारतीय पत्रकारिता का स्वभाव।
हमने क्या लिया और क्या देंगे हम आने वाली पीढ़ी को
साल 1819 में देश में पहली बार विशुद्ध भारतीय समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ था जिस के प्रकाशक थे राजा राममोहन राय।
बंगाली भाषा में प्रकाशित इस समाचार पत्र का नाम था "संवाद कौमुदी", जिस का हिंदी अर्थ होता है बुद्धि का चांद।
इसके बाद कई भाषाई और हिंदी अखबार भारत में चालू भी हुए और बंद भी हुए। लेकिन एक समानता सभी अखबारों में समान थी। वह था उस वक्त के प्रकाशको और पत्रकारों ने अपनी कलम को समाज और राष्ट्र की सेवा का माध्यम बनाया। सती प्रथा बाल विवाह जातिवाद आडंबर का उन्मूलन करने में सही मायनों में अखबार ने महती भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं देश में क्रांतिकारी भावना को जगाने में राष्ट्र को एकजुट करने में इन अखबारों ने अमूल्य योगदान दिया था।
लेकिन पत्रकारिता और समाचार पत्र के विकास के 200 साल पूरे होने पर जो स्थिति बनी है वह बहुत ही अफसोसजनक और पीड़ादायक।
कहने में अच्छा तो नहीं लगता लेकिन हकीकत यही है कि आज की पत्रकारिता मैं समाज सेवा, मानवता, करुणा, समाज और देश के प्रति कुछ कर गुजरने या उसमें परिवर्तन लाने की भावना समाप्त हो गई है। लगता है आज के समाचार पत्र और पत्रकार सिर्फ एक ही भावनाओं को पकड़ कर बैठे हैं कि उन्हें स्वयं का महत्व तो दिखाना है, अधिकार जताना है लेकिन जब बात कर्तव्य की हो तो उस वक्त पीठ दिखा कर निकल जाना है।
केवल पैसे और पैसे के लिए आज के प्रकाशक और पत्रकार दिन रात एक किए हुए। उनमें इतना तक भाव नहीं है कि वह जो समाचार लिख रहे हैं उससे समाज में देश में प्रतिकूल या अनुकूल प्रभाव पड़ेगा, समाज वैचारिक रूप से उन्नत होगा या वैचारिक रूप से नीचे गिरेगा, उस समाचार का महत्व आमजन के जीवन को सुगम बनाएगा या दुर्गम कर देगा, इत्यादि इत्यादि अनेकों अनेक चीजों को दरकिनार कर केवल अपने और अपने प्रकाशक के लिए लाभ कमाने तक आज की पत्रकारिता ठहर सी गई है।
क्या भारत अपने पूर्ण विकास को प्राप्त कर चुका है, क्या आम जनजीवन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ जीवन यापन और विकल्पों का चयन कर चुकी है, यदि नहीं तो पत्रकारिता का यह स्वरूप वास्तव में भयावह और डराने वाला है।
सोमवार, 1 जून 2020
राजनीति में गणेश परिक्रमा एवं एक व्यक्ति के चेहरे पर बढ़ता भरोसा, राजनितिक दलों के पतन का कारण
दरअसल किसी भी पार्टी के हाशिए पर जाने में पार्टी समर्थकों की यही सोच सबसे बड़ी कारण बन जाती है।
जब विद्यार्थी अपनी मेहनत के स्थान पर नकल और अपने अभिभावक के उच्च प्रभाव के कारण अपने परिणाम को सुनिश्चित पाता है तू उसकी सीखने की क्षमता घट जाती है और यहीं से शुरू होता है उसका नैतिक और सामाजिक पतन।
कुछ इसी प्रकार के कारक राजनीतिक दलों के लिए भी सत्ता से दूर होने का वजह बन जाता है।
इसका हालिया प्रमाण भाजपा के 6 साल के शासन में प्रमाणित हुआ है। एक समय भारत के राजनीतिक नक्शे पर करीब 84 परसेंट आबादी केसरिया रंग में रंग चुकी थी, लेकिन कार्यकर्ताओं और चुनाव लड़ने वाले नेताओं के केंद्रीय चेहरे पर निर्भर होने की कारण वह धीरे-धीरे अब करीब 48 फ़ीसदी पर शासन पर सिमट चुकी है।
राजनीतिक का मूल मंत्र मेरे अनुसार 123 होता है।
1 अर्थात एक लक्ष्य का चयन।
2 अर्थात अपने मेहनत के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को भी सामने के परीक्षा के लिए पूर्णरूपेण स्वयं पर निर्भर होना और करना।
3 अर्थात लक्ष्य के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल के सिद्धांत का प्रतिपादन। अर्थात चुनाव जीतने के लिए मानसिक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तीनों ही स्तर पर बढ़त बनाने का प्रयास इस रूप में कि चुनाव को जीतना ही नहीं अपितु अपने अलावे सभी उम्मीदवारों का जमानत जप्त करवा देना है इसका भरसक प्रयास स्थानीय स्तर पर हो।
कहने का तात्पर्य कि अगर आप 100 मीटर की दौड़ में भाग लेना चाहते हैं और तैयारी भी 100 मीटर की करते हैं तो संभव है की प्रतिस्पर्धा के दिन शारीरिक या मानसिक किसी भी कारण से आप 80 मीटर या 90 मीटर में थक जाए।
लेकिन अगर यह तैयारी 200 मीटर दौड़ के हिसाब से की जाए तो सुनिश्चित है आप 100 मीटर की दौड़ बगैर किसी बाधा के अपने सभी प्रतिभागियों को पीछे छोड़ जीत लेंगे।
भारतीय राजनीति की एक परिपाटी रही है कि जिसने जमीन से जुड़कर स्वयं के भरोसे चुनाव जीतने का काम किया है आगे चलकर वहीं देश के लिए आदर्श भी बने हैं।
लेकिन यह आदर्श बनने की होड़ आजकल गणेश परिक्रमा के कारण कहीं पीछे छूटती नजर आ रही है।
अभी समय है कि राजनीतिक दल के प्रमुखों को अपने दल की मर्यादा को बनाए रखने के लिए जनता को जनता के सुख-दुख का सहयोगी और समर्पित नेता देने के लिए उन्हें संगठन और नेताओं की परिक्रमा से परहेज करवाने के लिए कोई नीति तय करनी होगी।
सोमवार, 23 मार्च 2020
घर में कुछ दिनों के लिए रहे या दुनिया हमेशा के लिए छोड़ें, चयन हमारा
महामारी का रूप ले चुके "कोरोना"को हराना है या जिन्दगी हारना है
सम्राट कुमार
लाखोँ लोगों को अपने चपेट में ले चुके इस वायरस से अब तक हजारों की मौत हो चुकी है और वो भी दुनिया के सबसे अमीर और व्यवस्थित चिकित्सा व्यवस्था वाले देश अमेरिका,इटली,चीन,फ़्रांस एवं अन्य यूरोपियन देशो में| वजह केवल एक थी वे भी इसकी भयावहता को मजाक में ले रहे थे, परिणाम आपके सामने है
22 मार्च को जब हम सबने हमारे यस्शवी प्रधानमंत्री श्री मोदी जी के आग्रह पर एक दिन की जनता कर्फ्यू को सफल बनाया तो दुनिया को लगा की भारत के अनुशासनप्रिय लोग कोरोना को बिना ज्यादा मेहनत के हरा देंगे, लेकिन अगले ही दिन हमने दुनियाभर के लोगों के इस विश्वास को तोड़ दिया
लाकडाउन के बाद हमारा सडको पर उतरना इस खतरे को खुला निमन्त्रण है और हमारे 22 मार्च के प्रयास पर पानी फिर गया
सरकार का कार्य जनता की सुरझा है लेकिन जब जनता स्वयं अपना अहित करने पर आमदा हो जाए तो कर्फ्यू जैसे सख्त कदम उठाने पड़ते है क्योकि हम है तो देश है
इसलिए अब भी समय है कोरोना को हराने की जंग में हम स्वयं को कुछ दिनों के लिए घर के अन्दर रहकर, सरकार के निर्देशों का पालन कर "कोरोना" को हरा सकते है ,
अन्यथा "कोरोना " हमें हराने तो आ ही चूका है
तय कीजिए कोरोना या जिन्दगी
