शनिवार, 27 जुलाई 2024

Electricity Connection New Rules: बिजली उपभोक्ताओं के लिए नियमों में बदलाव, अब 3 दिन में मिलेगा नया कनेक्शन, जानें डिटेल

Electricity Connection New Rules: सरकार ने बिजली उपभोक्ताओं के लिए नए कनेक्शन लेने और छतों पर लगने वाली सौर इकाइयों के लिए नियम सरल बनाए हैं। नए बिजली कनेक्शन अब महानगरीय क्षेत्रों में तीन दिन, नगरपालिका क्षेत्रों में सात दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 15 दिन में मिलेंगे।

सम्राट कुमार 

Electricity Connection New Rulesसरकार ने बिजली उपभोक्ताओं के लिए नए कनेक्शन लेने और छतों पर लगने वाली सौर इकाइयों के लिए नियम सरल बनाए हैं। इसके तहत नए बिजली कनेक्शन अब महानगरीय क्षेत्रों में तीन दिन, नगरपालिका क्षेत्रों में सात दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 15 दिन में मिलेंगे। बिजली मंत्रालय ने शुक्रवार को जारी बयान में कहा कि सरकार ने इससे संबंधित बिजली (उपभोक्ता अधिकार) नियम, 2020 में संशोधन को मंजूरी दे दी है। मंत्रालय ने कहा कि संशोधनों के बाद छत पर सौर बिजली इकाई लगाने की प्रक्रिया भी सरल हो गई है। साथ ही इसमें बहुमंजिला फ्लैटों में रहने वाले उपभोक्ताओं को भी कनेक्शन का प्रकार चुनने का अधिकार दिया गया है। इसके अलावा आवासीय सोसाइटी में सामान्य क्षेत्रों और बैक-अप जनरेटर के लिए अलग-अलग बिलिंग सुनिश्चित की गई है जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।

संशोधित नियम में उपभोक्ताओं की शिकायतों के मामले में बिजली की खपत के सत्यापन के लिए वितरण कंपनियों द्वारा लगाए गए मीटरों की जांच का भी प्रावधान किया गया है। केंद्रीय बिजली मंत्री आर के सिंह ने कहा कि सरकार के लिए उपभोक्ताओं का हित सर्वोपरि है। ये संशोधन इसी को ध्यान में रखते हुए किए गए हैं। बयान के मुताबिक, नया बिजली कनेक्शन मिलने की अवधि महानगरीय क्षेत्रों में सात दिन से घटाकर तीन दिन, अन्य नगर निगम क्षेत्रों में 15 दिन से घटाकर सात दिन और ग्रामीण क्षेत्रों में 30 दिन से घटाकर 15 दिन कर दी गई है। हालांकि, पहाड़ी क्षेत्रों के ग्रामीण इलाकों में नए कनेक्शन लेने या मौजूदा कनेक्शन में संशोधन के लिए समय अवधि पहले की तरह 30 दिन ही रहेगी।
इस संशोधन ने छत पर सौर प्रणाली स्थापित करने को भी अधिक सरल और तीव्र बना दिया है। मंत्रालय ने कहा कि 10 किलोवाट की तक की सौर प्रणालियों के लिए तकनीकी व्यवहार्यता अध्ययन की जरूरत नहीं होगी। इससे अधिक क्षमता की सौर प्रणालियों के लिए व्यवहार्यता अध्ययन की समयसीमा 20 दिन से घटाकर 15 दिन कर दी गई है। यदि निर्धारित समय के भीतर अध्ययन पूरा नहीं होता है तो उसे अनुमोदित माना जाएगा। नए नियमों के तहत उपभोक्ता अब अपने इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को चार्ज करने के लिए अलग से बिजली कनेक्शन ले सकते हैं। यह देश के कार्बन उत्सर्जन को कम करने और 2070 तक शुद्ध रूप से शून्य कार्बन उत्सर्जन तक पहुंचने के लक्ष्य के अनुरूप है।
सहकारी हाउसिंग सोसाइटी, बहुमंजिला इमारतों, आवासीय कॉलोनी आदि में रहने वाले लोगों के पास अब वितरण लाइसेंसधारी से या तो सभी के लिए व्यक्तिगत कनेक्शन या पूरे परिसर के लिए सिंगल-प्वाइंट कनेक्शन चुनने का विकल्प होगा। इसके साथ ही मीटर रीडिंग वास्तविक बिजली खपत के अनुरूप नहीं होने की शिकायत होने पर वितरण लाइसेंसधारी को अब शिकायत मिलने की तारीख से पांच दिनों के भीतर एक अतिरिक्त मीटर लगाना होगा। इस अतिरिक्त मीटर का इस्तेमाल रीडिंग के सत्यापन के लिए किया जाएगा।

बुधवार, 3 मार्च 2021



बिहार सरकार के भूमि राजस्व विभाग में बरसों से कार्यरत है "भगवान"

सम्राट कुमार 

जी आपने सही शीर्षक पढा है। यह किसी कवि की कल्पना नहीं और ना ही कोई आकर्षक शीर्षक है, बल्कि यह भूमि राजस्व विभाग के मुजफ्फरपुर जिला में भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी के एक निर्णय के अवलोकन से यह सत्य जाहिर हुआ है। 

 बिहार सरकार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 11 सितंबर 2019 को पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कहा था कि बिहार में कुल अपराध में 60 फ़ीसदी अपराध भूमि विवाद के कारण होते हैं। मुख्यमंत्री की इस स्वीकारोक्ति एवं भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी के आदेश को अगर एक परिपेक्ष में रखें तो पता चलता है कि बिहार में हजारों करोड़ खर्च कर होने वाले चकबंदी व्यर्थ है। क्योकि अगर पुराने विवाद ही समाप्त नहीं हुए तो नए चकबंदी से विवाद हटेगा नहीं और बढ़ जाएगा 


आपके मन में यह जिज्ञासा आपको परेशान कर रही होगी कि आखिर बिहार भूमि राजस्व विभाग में भगवान कैसे नियुक्त है। आइए आपकी इस उत्कंठा को हम शांत करते हैं। दरअसल मुजफ्फरपुर जिले के भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी द्वारा दाखिल खारिज वाद संख्या 163/12-13 में दिनांक 29-9 -2016 को पारित आदेश में लिखा है कि उत्तर वादी संख्या एक के वारिसों ने दिनांक 22 फरवरी 2017 को एक आवेदन दिया जिसमें उन्हें पक्षकार बनाने की बात कही गई थी।

 अब आप ही बताएं अपने आदेश के 5 महीने बाद होने वाली घटना को तारीख सहित अपने आदेश में उल्लेख करने वाले पदाधिकारी क्या सामान्य इंसान होंगे। भविष्य में नियत तारीख को क्या होगा यह ईश्वर के अलग है कोई नहीं जानता। ऐसे में भूमि राजस्व विभाग के भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी क्या भगवान से कम है?

अब आते हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा अपराध में 60% योगदान भूमि विवाद के संदर्भ पर। इसी आदेश के अगले पंक्ति में भूमि सुधार उप समाहर्ता पश्चिमी या कहें भगवान ने कहा है कि चुकी विवादित जमीन पर मकान है इसलिए दाखिल खारिज कैंसिल नहीं किया जा सकता है। मुजफ्फरपुर में वरीय आरक्षी अधीक्षक आवास के पास के सिकंदरपुर मन की जमीन को भी बहुत सारे लोगों ने दाखिल खारिज करा कर मकान बना लिया है। इस आदेश के अनुसार वह सारे वैध होगा।

अंत मे मुख्यमंत्री की बात और निर्णय के अवलोकन के पश्चात यही निष्कर्ष निकलता है कि बिहार में भूमि विवाद को बढ़ावा देने में आम लोगों से ज्यादा बिहार भूमि राजस्व विभाग के "कथित भगवान" की भूमिका ज्यादा है। अब निर्णय के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो यह भी संभावना बनती है कि उक्त भूमि सुधार उप समाहर्ता ने अपने स्थानतरण के बाद जब इस मामले की पैरवी करने विपक्षी पार्टी ने किसी तरह से सेटिंग कर ली तो 22 फरवरी 2017 को आवेदन दिया और उस आवेदन के आलोक में स्थानांतरित भूमि सुधार उप समाहर्ता ने पूर्व की तारीख में अपना निर्णय दिया। लेकिन वह कहते हैं ना की 

"सत्यमेव जयते  "  लाख झूठ को छिपाने का प्रयास करो सत्य में वो ताप है प्रकट हो ही जाएगा
 

 

बुधवार, 24 जून 2020

आखिरकार 200 सालों में कितना बदल गया भारतीय पत्रकारिता का स्वभाव।


हमने क्या लिया और क्या देंगे हम आने वाली पीढ़ी को


साल 1819 में देश में पहली बार विशुद्ध भारतीय समाचार पत्रों का प्रकाशन शुरू हुआ था जिस के प्रकाशक थे राजा राममोहन राय।
बंगाली भाषा में प्रकाशित इस समाचार पत्र का नाम था "संवाद कौमुदी", जिस का हिंदी अर्थ होता है बुद्धि का चांद।
इसके बाद कई भाषाई और हिंदी अखबार भारत में चालू भी हुए और बंद भी हुए। लेकिन एक समानता सभी अखबारों में समान थी। वह था उस वक्त के प्रकाशको और पत्रकारों ने अपनी कलम को समाज और राष्ट्र की सेवा का माध्यम बनाया। सती प्रथा बाल विवाह जातिवाद आडंबर का उन्मूलन करने में सही मायनों में अखबार ने महती भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं देश में क्रांतिकारी भावना को जगाने में राष्ट्र को एकजुट करने में इन अखबारों ने अमूल्य योगदान दिया था।
लेकिन पत्रकारिता और समाचार पत्र के विकास के 200 साल पूरे होने पर जो स्थिति बनी है वह बहुत ही अफसोसजनक और पीड़ादायक।
कहने में अच्छा तो नहीं लगता लेकिन हकीकत यही है कि आज की पत्रकारिता मैं समाज सेवा, मानवता, करुणा, समाज और देश के प्रति कुछ कर गुजरने या उसमें परिवर्तन लाने की भावना समाप्त हो गई है। लगता है आज के समाचार पत्र और पत्रकार सिर्फ एक ही भावनाओं को पकड़ कर बैठे हैं कि उन्हें स्वयं का महत्व तो दिखाना है, अधिकार जताना है लेकिन जब बात कर्तव्य की हो तो उस वक्त पीठ दिखा कर निकल जाना है।
केवल पैसे और पैसे के लिए आज के प्रकाशक और पत्रकार दिन रात एक किए हुए। उनमें इतना तक भाव नहीं है कि वह जो समाचार लिख रहे हैं उससे समाज में देश में प्रतिकूल या अनुकूल प्रभाव पड़ेगा, समाज वैचारिक रूप से उन्नत होगा या वैचारिक रूप से नीचे गिरेगा, उस समाचार का महत्व आमजन के जीवन को सुगम बनाएगा या दुर्गम कर देगा, इत्यादि इत्यादि अनेकों अनेक चीजों को दरकिनार कर केवल अपने और अपने प्रकाशक के लिए लाभ कमाने तक आज की पत्रकारिता ठहर सी गई है।
क्या भारत अपने पूर्ण विकास को प्राप्त कर चुका है, क्या आम जनजीवन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ जीवन यापन और विकल्पों का चयन कर चुकी है, यदि नहीं तो पत्रकारिता का यह स्वरूप वास्तव में भयावह और डराने वाला है।




सोमवार, 1 जून 2020

राजनीति में गणेश परिक्रमा एवं एक व्यक्ति के चेहरे पर बढ़ता भरोसा, राजनितिक दलों के पतन का कारण

नेताओं की गणेश परिक्रमा नहीं जनता से सीधा जुड़ाव है असल राजनीति

एक व्यक्ति के चेहरे से नहीं स्वयं के चेहरे पर लड़े चुनाव,जीत के लिए लझ्य बड़ा होना आवश्यक

सम्राट कुमार

राजनीतिक में खास करके जब किसी पार्टी की सरकार होती है तो उनके समर्थकों में एक भरोसा होता है अपने नेतृत्व के प्रति। कभी-कभी कुछ करिश्माई चेहरे जैसे लालू प्रसाद यादव,नीतीश कुमार, जयललिता, और हालिया प्रकरण नरेंद्र दामोदरदास मोदी ऐसे व्यक्तित्व के साथ अपनी राजनीतिक पारी को शुरू किए की पार्टी नित्य नए आयाम को गढ़ती चली गई। समर्थकों को यह भरोसा हो चला कि वह बगैर मेहनत किए अपने पार्टी नेतृत्व के भरोसेमंद और जनप्रिय छवि के आधार पर चुनाव जीत सकते हैं।
दरअसल किसी भी पार्टी के हाशिए पर जाने में पार्टी समर्थकों की यही सोच सबसे बड़ी कारण बन जाती है।
जब विद्यार्थी अपनी मेहनत के स्थान पर नकल और अपने अभिभावक के उच्च प्रभाव के कारण अपने परिणाम को सुनिश्चित पाता है तू उसकी सीखने की क्षमता घट जाती है और यहीं से शुरू होता है उसका नैतिक और सामाजिक पतन।
कुछ इसी प्रकार के कारक राजनीतिक दलों के लिए भी सत्ता से दूर होने का वजह बन जाता है।
इसका हालिया प्रमाण भाजपा के 6 साल के शासन में प्रमाणित हुआ है। एक समय भारत के राजनीतिक नक्शे पर करीब 84 परसेंट आबादी केसरिया रंग में रंग चुकी थी, लेकिन कार्यकर्ताओं और चुनाव लड़ने वाले नेताओं के केंद्रीय चेहरे पर निर्भर होने की कारण  वह धीरे-धीरे अब करीब 48 फ़ीसदी पर शासन पर सिमट चुकी है।
राजनीतिक का मूल मंत्र मेरे अनुसार 123 होता है।
1 अर्थात एक लक्ष्य का चयन।
2 अर्थात अपने मेहनत के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को भी सामने के परीक्षा के लिए पूर्णरूपेण स्वयं पर निर्भर होना और करना।
3 अर्थात लक्ष्य के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल के सिद्धांत का प्रतिपादन। अर्थात चुनाव जीतने के लिए मानसिक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तीनों ही स्तर पर बढ़त बनाने का प्रयास इस रूप में कि चुनाव को जीतना ही नहीं अपितु अपने अलावे सभी उम्मीदवारों का जमानत जप्त करवा देना है इसका भरसक प्रयास स्थानीय स्तर पर हो।

कहने का तात्पर्य कि अगर आप 100 मीटर की दौड़ में भाग लेना चाहते हैं और तैयारी भी 100 मीटर की करते हैं तो संभव है की प्रतिस्पर्धा के दिन शारीरिक या मानसिक किसी भी कारण से आप 80 मीटर या 90 मीटर में थक जाए।
लेकिन अगर यह तैयारी 200 मीटर दौड़ के हिसाब से की जाए तो सुनिश्चित है आप 100 मीटर की दौड़ बगैर किसी बाधा के अपने सभी प्रतिभागियों को पीछे छोड़ जीत लेंगे।

अब आप विचार कीजिए इस प्रकार की तैयारी अगर राजनीतिक दल के चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी स्वयं कर ले और उनके साथ वह करिश्माई नेतृत्व का भी प्रभाव मिल जाए तो परिणाम आशातीत होगा। किस कारण से मिलने वाली जीत जहां कार्यकर्ताओं के मनोबल को आठ में आसमान पर ले जाती है चुनाव लड़ रहे नेताओं की प्रतिष्ठा में भी चार चांद लगती है। फिर भी ना जाने किन कारणों से प्रत्याशी इस प्रकार की तैयारियां करने की जगह अपने टिकट के लिए पार्टी के प्रमुख और अपने पसंदीदा उच्च पदस्थ नेताओं के परिक्रमा में अपना समय गवा देते। इसके बाद परिणाम अगर मनचाहा नहीं मिला तो दोष स्वयं की कमी को देने के स्थान पर संगठन कार्यकर्ता विद्रोह इत्यादि का बहाना बनाकर दूसरों पर दोषारोपण करने लगते हैं।
भारतीय राजनीति की एक परिपाटी रही है कि जिसने जमीन से जुड़कर स्वयं के भरोसे चुनाव जीतने का काम किया है आगे चलकर वहीं देश के लिए आदर्श भी बने हैं।
लेकिन यह आदर्श बनने की होड़ आजकल गणेश परिक्रमा के कारण कहीं पीछे छूटती नजर आ रही है।
अभी समय है कि राजनीतिक दल के प्रमुखों को अपने दल की मर्यादा को बनाए रखने के लिए जनता को जनता के सुख-दुख का सहयोगी और समर्पित नेता देने के लिए उन्हें संगठन और नेताओं की परिक्रमा से परहेज करवाने के लिए कोई नीति तय करनी होगी।